
पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की सख्ती के उपरांत सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप यह बताता है कि कानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर संविधान द्वारा नागरिकों को मिली आजादी का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कोर्ट द्वारा हिरासत में रखे लोगों को रिहा करने, मेट्रो सेवाएं बहाल करने तथा इंटरनेट सुविधा यथाशीघ्र चालू करने का निर्देश देकर कोर्ट ने साफ संदेश देने का प्रयास किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में एक मूलभूत अधिकार है, न कि सरकार द्वारा दी गई सुविधा। उल्लेखनीय है कि गत दस अक्तूबर को कॉकरोच जनता पार्टी और कुछ अन्य संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। जिसको रोकने के लिये दिल्ली सरकार ने अभूतपूर्व सुरक्षा उपाय किए थे। इस दौरान सात हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने को लेकर सवाल उठाये गए। लोगों ने जगह-जगह सड़कों पर अवरोधक लगाने, क्षेत्र के मेट्रो स्टेशनों पर बंदिश लगाने तथा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध सख्ती को लेकर चिंता जाहिर की। कहा गया कि पुलिस ने एहतियाती दायित्वों से बढ़कर आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की। निस्संदेह, आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जवाबदेही अधिकारियों की बनती है। जब आंदोलन आदि के दौरान हिंसा होने और सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की आशंका हो तो आसन्न खतरों के मद्देनजर अधिकारियों की कार्रवाई करना बनता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इन अधिकारों का उपयोग कानून की सीमाओं में ही किया जा सकता है।
लेकिन सवाल है कि सिर्फ शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने पर लोगों को हिरासत में लेना, निर्धारित निषेधाज्ञा वाले इलाकों से बहुत दूर तक आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना, सार्वजनिक सेवाओं पर रोक लगे तो क्या यह आम लोगों को दंड देने जैसा नहीं है? तभी शीर्ष अदालत ने कोर्ट-परिसर के आस-पास रोक लगाने वाले नोटिस भी तुरंत हटाने के निर्देश दिए। जिससे नागरिक-अधिवक्ता बिना किसी बाधा के यहां पहुंच सकें। दरअसल, विपक्षी दल लोगों को हिरासत में रखने और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की निष्पक्ष जांच की भी मांग कर रहे हैं। निस्संदेह, पुलिस को भी अपनी बात रखने का मौका दिया जाए। बेशक, प्रदर्शनकारियों के साथ ही कानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी जवाबदेह बनाया जाए। यह एक हकीकत है कि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता का भरोसा विश्वसनीय जवाबों, खुली व निष्पक्ष जांच और संस्थागत आजादी पर ही निर्भर करता है। वहीं एक मजबूत लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लेकर संशय नहीं होना चाहिए। जरूरी है कि वह असंतुष्ट लोगों की शिकायतों को सुनें, असहमति का सम्मान करते हुए कानून-व्यवस्था बनाये रखें और अदालत के निर्देशों का सम्मान करें। निस्संदेह, शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण सीमा-रेखा खींची है। इसी आलोक में सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों में संविधान प्रदत स्वतंत्रता का अतिक्रमण न हो। हालांकि, सीजेपी व विपक्ष के तेवरों को देखते हुए यह करना आसान भी नहीं होगा।








